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Exclusive Report -झारखंड में आदिवासियों की हालत बदतर कुपोषण ,मलेरिया के शिकार हैं हज़ारों बच्चे

Namami Bharat 2017-07-04 08:28:57

झारखंड के कोल्हान क्षेत्र अंतर्गत सारंडा एवं आसपास के क्षेत्रों में आदिवासियों की हालत चिंताजनक है. आदिवासियों की स्थिति को नजदीक से जानने - समझने के लिए झारखंड के विनोबा भावे विश्वविद्यालय के एलएलबी के छात्र संजय मेहता इन दिनों नक्सल प्रभावित सारंडा वन क्षेत्र में हैं.

 

वे गाँव - गाँव जाकर , आदिवासियों के बीच समय बिताकर उनकी स्थितियों का अध्ययन कर रहे हैं. संजय मेहता का यह प्रयास एक व्यक्तिगत प्रयास है.आदिवासियों  से आत्मीय जुड़ाव के कारण वे व्यक्तिगत तौर पर इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं.पिछले माह की 21 जून से लगातार वे गाँवों का दौरा कर आदिवासियों से मिल रहे हैं.उनके दर्द को बांट रहे हैं.

पढ़िए सारंडा के बीहड़ों से छात्र संजय मेहता की यह रिपोर्ट......

 

झारखंड की राजधानी राँची से चाईबासा की दूरी 136 किमी है. वहीं सारंडा लगभग 200 किमी दूर है. चाईबासा झारखंड के कोल्हान प्रमंडल का मुख्यालय है . इस क्षेत्र को पश्चिमी सिंहभूम एवं लोहांचल के नाम से जाना जाता है. इन क्षेत्रों में आदिवासियों की हालत जानवरों से भी बदतर है . आदिवासी जीविका के लिए तरस रहे हैं .

 

आदिवासी गाँव के लगभग हर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. बच्चों को शिशुकाल में पोषण नहीं मिल रहा है. बच्चों की हालत चिंताजनक है. गर्भवती महिलाओं को भयंकर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. लौह अयस्क क्षेत्र होने के कारण लोगों को पीने के पानी की भी समस्या है.

 

21 जून से लगातार मैं इस क्षेत्र के तमाम गाँवों में वक्त गुजार कर इनकी स्थितियों का पड़ताल कर रहा हूँ.हर तरफ निराशा और बेबसी है. ऐसा प्रतीत होता है जैसे इन्हें अपने हाल पर छोड़ दिया गया है. आदिवासियों की जो हालत इस क्षेत्र में है वह रोंगटे खड़ी करती है. काफी निराशाजनक स्थिति है. क्षेत्र के किरीबुरू ,  मेघाहातुबुरु , बदजामदा , गुवा , कोटगढ़ , जेटेया , बड़ापसिया , लोकसाई , बालिझरण , दिरीबुरु , बराईबुरु , टाटीबा , पेटेता, पोखरपी , कादजामदा , महुदी , नोवामुंडी समेत कई अन्य गाँवों में आदिवासी जिंदगी से जद्दोजहद कर रहे हैं.

 

सरकार - सिस्टम पूरी तरह फेल

 

आदिवासी परिवारों की हालत देखकर यह कहा जा सकता है कि सरकार और सिस्टम इस क्षेत्र में पूरी तरह फेल है . अस्पतालों में डॉक्टर नहीं , स्कूलों में शिक्षक नहीं , गाँव का हर बच्चा कुपोषण का शिकार . जीविका के लिए प्रकृति पर निर्भरता.  शासन व्यवस्था से कटे इन गाँवों की हालत  सरकार एवं नौकरशाही के कार्यशैली पर सवालिया निशान खड़ी करती है.

 

यूनिसेफ और राज्य सरकार के रिपोर्ट में हो चुकी है कुपोषण की पुष्टि

 

फरवरी 2017 में राज्य सरकार एवं यूनिसेफ की एक रिपोर्ट जारी की गई थी जिसमे कहा गया था कि सारंडा क्षेत्र के 20 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं.

इस रिपोर्ट में सही आंकड़ा नहीं पेश किया गया. सच्चाई को छुपा दिया गया. क्षेत्र की जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है. 20 प्रतिशत से कहीं अधिक लगभग बच्चे कुपोषण के शिकार हैं. लगभग हर आदिवासी बच्चा कुपोषण का शिकार है. बच्चे हड़िया पीकर जीवित हैं. बच्चों के पेट फुले हुए हैं. कई बच्चे बीमारी से मर भी जाते हैं .लेकिन किसी को कुछ पता भी नहीं चल पाता.

 

सुदूर गाँवों में सुविधाएं मयस्सर नहीं

 

इस क्षेत्र के सुदूर गाँवों में सरकारी सुविधाओं का बुरा हाल है. ग्रामीणों के सामने पीने के पानी के लाले हैं. बेरोजगारी चरम सीमा पर है. कई गांवों में बिजली भी नहीं पहुँची है. कई क्षेत्रों में सड़कों की हालत जर्जर है. कुछ गाँवों में सड़कें बनी हैं.

 

पंचायती चुनाव से चुनकर आए जनप्रतिनिधि भी खनन क्षेत्र होने के कारण विकास योजनाओं को जनता तक नहीं पहुंचा पा रहे हैं. किरीबुरू पंचायत की मुखिया पार्वती कीड़ो ने बताया कि सेल लीज क्षेत्र होने के कारण विकास की राशि वापस चली जाती है. सेल अनापत्ति प्रमाण पत्र प्रदान नहीं करती है क्योंकि सेल का अपना सीएसआर का कार्य होता है. उन्होंने कहा कि इस ओर कई बार पदाधिकारियों का ध्यान आकृष्ठ कराया गया लेकिन कुछ नहीं हुआ.

 

क्या कहते हैं ग्रामीण

 

क्षेत्र के कोटगढ़ पंचायत के काठिकोडा गाँव के संतोष लागुरी कहते हैं कि हम गरीब लोग हैं. सरकार हमारे ऊपर ध्यान नहीं दे रही है. गाँव के बच्चे मलेरिया - कुपोषण से पीड़ित हैं. हमलोग तंग आ चुके हैं.

 

किरीबुरू के जोलजेल बिरुआ दुर्दशा  बताते हुए कहते हैं कि सरकार की हर योजना फेल है. हमलोग को कुछ सुविधा कहीं से नहीं मिल रहा है. बडाजामदा के प्रफुल्लो नाकुड़ ने कहा कि हमारे क्षेत्र में विकास का काम भगवान भरोसे है. बच्चे बीमार रहते हैं.अस्पताल में डॉक्टर नहीं आते हैं.हमलोग करे भी तो क्या करें ?

 

गुवा के जुदा बोदरा ने कहा कि एक तो हमलोग बेरोजगार है. ऊपर से सरकार मदद नहीं करती. बच्चों को बीमारी हो जा रही है.मलेरिया का प्रकोप है. कुछ सुविधा नहीं मिलती.हमलोग बहुत मुश्किल में हैं.

 

बड़ापासिया गाँव के घनश्याम बोबोंगा कहते हैं  कि आदिवासियों की हालत बहुत खराब है. हमलोग निम्न स्तर की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. सरकार की सुविधा हमलोगों को नसीब नहीं है. कोई अधिकारी भी इधर कभी नहीं आते हैं.

 

ग्रामीणों ने बताया कि खराब पानी के कारण हम सबों के पैरों एवं नाखूनों में अलग तरीके का संक्रमण हो गया है. नोवामुंडी की आदिवासी महिलाओं ने कहा कि हम कोलई नाम के कीड़े को भूनकर खाते हैं. इस कीड़े को भूनकर बेचते भी हैं . अभी के मौसम में यह हमारे भोजन और जीविका का मुख्य साधन है. कई अन्य गाँवों के ग्रामीणों ने भी अपना दुख व्यक्त किया.

 

मेरे द्वारा जब इस दुर्दशा को फेसबुक पर पोस्ट किया गया तो इसे रिपोर्ट कर दिया गया और बाद में इस पोस्ट को फेसबुक द्वारा हटा दिया गया. इस सच्चाई से कई लोग घबरा गए.

 

सारंडा एक्शन प्लान छलावा: ग्रामीण

 

ग्रामीण कहते हैं झारखंड बनने के बाद आदिवासियों के विकास की बात कही गयी . कई वादे किए गए . करोड़ों रुपये खर्च किये गए . केंद्र सरकार ने भी पहल की लेकिन तस्वीर नहीं बदली. पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने भी इस क्षेत्र में कई दौरा किया था. फिर भी तमाम दावों के बावजूद आदिवासियों की हालत नहीं बदली.

 

आदिवासी जानवरों की जिंदगी जीने को मजबूर हैं. लोगों की निराशा आक्रोश का रूप धारण कर रही है. व्यवस्था के प्रति इनलोगों में गुस्सा बढ़ा है. पूरे क्षेत्र के हालात खुद बयां करते हैं कि सारंडा एक्शन प्लान एक छलावा बनकर रह गया. आदिवासी आज भी वहीं हैं.