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रैवन की लोककथाएँ - 1 - : 8 सरदार का बक्सा // सुषमा गुप्ता

Rachanakar 2017-09-13 17:59:33

जब दुनिया बनी ही बनी थी तब सारी दुनिया में अँधेरा ही अँधेरा था। लोग दिन की रोशनी के बारे में आश्चर्य तो करते थे और बात भी करते थे पर किसी ने उसको देखा नहीं था।

कुछ लोगों का कहना था कि नदी का सरदार उसको अपने बक्से में छिपा कर रखता था।

अब रैवन तो अँधेरी दुनिया में ही रहता था। वह चालाक था, अक्लमन्द था, लालची था और हर चीज़ को जानने की उत्सुकता रहती थी उसमें। जब भी उसको जरूरत पड़ती वह अपनी शक्ल भी बदल सकता था।

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सो एक बार उसने दिन की रोशनी ढँूढने का विचार किया। इसके लिये उसने अपने आपको एक बहुत ही बारीक सुई में बदला और एक ताजे पानी के झरने में कूद गया।

अगले दिन जब नदी के सरदार की लड़की पानी पीने के लिये नदी पर आयी तो रैवन उसके प्याले में चला गया। लड़की को पता नहीं चला और वह उस सुई को पानी के साथ पी गयी और उसको बच्चे की आशा हो गयी।

कुछ समय बाद उस लड़की को बच्चा हुआ। यह रैवन ही था। रैवन बहुत जल्दी ही बड़ा हो गया। हालाँकि वह बहुत जल्दी गुस्सा हो जाता था और उसकी ऑखें रैवन की ऑखों की तरह से छोटी छोटी दिखायी देतीं थीं फिर भी उसके नाना उसको बहुत प्यार करते थे।

जब वह बहुत चिल्लाता तो उसके नाना उसको चाँद के बक्से से खेलने देते। एक बार उसने वह बक्सा खोला और चाँद को बाहर निकल जाने दिया।

जब रैवन फिर रोया तो उसके नाना ने उसे दिन की रोशनी वाले बक्से से खेलने दिया। जैसे ही वह बक्सा उसके कब्जे में आया उसने अपने आपको रैवन चिड़िया में बदला और उस बक्से को ले कर वह उस घर में बनी चिमनी में से हो कर बाहर अँधेरे में गुम हो गया।

रैवन उस बक्से को अपने आदमियों के पास ले आया और उसे बहुत थोड़ा सा खोला, केवल इतना कि उस बक्से में से केवल कुछ किरनें ही बाहर निकल पायीं।

लेकिन उन आदमियों को विश्वास ही नहीं हुआ कि रैवन के पास दिन की रोशनी थी। इस बात से तंग हो कर उसने पूरा का पूरा बक्सा ही खोल दिया और सारी दुनिया दिन की रोशनी से भर गयी।

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सुषमा गुप्ता ने देश विदेश की 1200 से अधिक लोक-कथाओं का संकलन कर उनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. कुछ देशों की कथाओं के संकलन का  विवरण यहाँ पर दर्ज है. सुषमा गुप्ता की लोक कथाओं की एक अन्य पुस्तक - रैवन की लोक कथाएँ में से एक लोक कथा यहाँ पढ़ सकते हैं. इथियोपिया की 45 लोककथाओं को आप यहाँ लोककथा खंड में जाकर पढ़ सकते हैं.

(क्रमशः अगले अंकों में जारी...)