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कान और जीभ की मदद से, अब अँधे लोग भी देख पायेंगे

Samachar Nama 2018-01-12 14:38:12

जब एक अंधा व्यक्ति किसी कमरे में प्रवेश करता है, तो वह कुछ भी देख नहीं पाता है। लेकिन उसके कान उसे अपने चारो तरफ का एक 360 डिग्री व्यू देते हैं, जो उसे रास्ता ढूंढने में मदद करता है। साइकिल चलाना, पर्वतारोहण, तथा शहर में घूमना, ये सब काम एक ब्लाइंड पर्सन के लिये ख़्वाब सच होने जैसा है। लेकिन डेनियल किश के लिये यह हक़ीक़त है। यह तकनीक इकोलोकेशन कहलाती है। चमगादड़ या व्हेल्स इसी तकनीक को अपनाकर अपना मार्ग खोजते हैं। इस तकनीक के इस्तेमाल से अंधे व्यक्ति अपनी दैनिक क्रियाएं संपन्न कर सकते हैं। बिना आँखों के वो सब काम कर सकते हैं, जो एक सामान्य व्यक्ति कर पाता है।

इस प्रक्रिया में किश सबसे पहले उस ऑब्जेक्ट की पहचान करने के लिए अपनी जीभ से एक क्षणिक और तेज क्लिक ध्वनि उत्पन्न करता है। ये ध्‍वनि तरंगें ऑब्जेक्ट से टकराकर उसी दर से वापस कान में आ जाती है। इस तरह वह चीजों को डिटेक्ट कर पाता है।

डेनियल किश की आँखों की रोशनी जन्म के समय ही रेटिनल कैंसर की वज़ह से चली गई थी। उसके बाद उसने अपने कान को ही अपनी आँख बना लिया। आमतौर पर हम कान का उपयोग आवाज़ सुनने के लिये करते हैं, परंतु किश के मामले में उसने इसे अपने आस-पास की चीजों से टकराकर आने वाले इको ध्वनियों को महसूस करने के लिये तैयार कर लिया है। वर्तमान में 51 साल की उम्र में किश ह्यूमन इकोलोकेशन विधा में पारंगत हो चुका है।

किश को रियल लाइफ बेटमैन भी कहा जाता है। टेड टॉक में चर्चा के दौरान किश ने बताया कि यह केवल वस्तुओं के आकार या दूरी से संबंधित नहीं है, बल्कि इकोलोकेशन आपको उस वस्तु के घनत्व और बनावट के बारे में भी सूचना उपलब्ध करवाता है। इस तरह वह एक पेड़, कार तथा लकड़ी के डिब्बे में अंतर पता कर पाते है। डेनियल किश इस तकनीक को ‘फ़्लैशसोनार’ कहते है, तथा इसे फैलाने के लिये एक गैर-लाभकारी संस्था वर्ल्ड ऐक्सैस फ़ॉर दी ब्लाइंड की स्थापना की है। यह संस्था अंधे व्यक्तियों को यह तकनीक सिखाने में मदद करती है।