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फांसी के तख्ते पर लीवर खींचने से पहले जल्लाद करता है यह काम, पहले नहीं सुनी होगी यह बात

Patrika 2018-08-09 12:40:26

नई दिल्ली। भारत में जब कोई अपराधी विरल से विरलतम अपराध करता है तब उसे फांसी की सजा दी जाती है।बात अगर नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की करें तो साल 2004 से 2013 के बीच भारत में कुल 1,303 अपराधियों को फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन इनमें से केवल तीन लोगों को ही फांसी दी गई।

साल 2004 में पश्चिम बंगाल के धनंजय चटर्जी को फांसी के तख्ते पर लटकाया गया था। उसने हेतल पारेख नामक एक 14 साल की लड़की के साथ बलात्कार किया था। इसके बाद साल 2012 में अजमल कसाब और 2013 में अफजल गुरू को फांसी दी गई।

साल 2015 में 1993 मुंबई ब्लास्ट में दोषी पाए जाने के बाद याकूब मेनन को नागपुर सेंट्रल जेल में फांसी के फंदे पर लटकाया गया। आज हम आपको फांसी से ही संबंधित एक बहुत ही महत्वपूर्ण और दिलचस्प बात कहेंगे।

 

जैसा कि हम जानते हैं कि फांसी जिंदगी का अंत है। मौत के दरवाजे पर खड़े हर मुजरिम को उस वक्त अपने द्वारा किए गए अपराध का पछतावा होता है, लेकिन उसके पास और कोई चारा नहीं होता है।

उस दौरान अपराधी का बहुत ख्याल रखा जाता है क्योंकि वह क्षण उसकी जिंदगी का आखिरी लम्हा होता है। ऐसे में जल्लाद भी उससे नरमी बरतता है।

जल्लाद ही वह शख्स है जो उस अपराधी को मौत के घाट उतारता है, लेकिन स्वयं जल्लाद के पास भी कोई और चारा नहीं होता है क्योंकि यह उसका काम है। अपनी रोजी रोटी के चलते उसे लीवर खींचना ही पड़ता है, लेकिन इससे पहले जल्लाद एक काम करता है। आखिर क्या?

 

दरअसल, फांसी देने से पहले जल्लाद अपराधी के कानों में कुछ कहता है। वह धीरे से मुजरिम के कान में कहता है कि मुझे माफ कर देना, तुम्हें फांसी देना मेरी मजबूरी है। मैं कानून के हाथों मजबूर हूं। इसके साथ ही अगर अपराधी हिन्दू है तो राम राम और यदि मुस्लिम है तो आखिरी सलाम कहकर वह लीवर खींच देता है।

फांसी के दौरान उस कक्ष में जल्लाद के साथ एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट, डॉक्टर, जेल अधीक्षक का होना भी अनिवार्य है। हैरान कर देने वाली बात तो यह है कि वर्तमान समय में भारत में जल्लादों की संख्या सिर्फ 2 ही है जो काफी लंबे समय से अपने परिवार की इस परंपरा का पालन करते आ रहे हैं।