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मायावती की माया कहीं सोनिया के सोने की चिड़ियां के सपने को उड़ा ना दे

My obedient ND 2018-10-09 22:04:40

हाथी का दबाव हाथ के लिए असहनीय हो सकता है।
मायावती द्वारा कांग्रेस को एक जातिवादी और सांप्रदायिक पार्टी कहा जाना साथ ही साथ यह भी कहा जाना कि कांग्रेस पार्टी नहीं चाहती कि बसपा का अस्तित्व रहे, कहीं ना कहीं कांग्रेस के लिए सोचनीय प्रश्नचिन्ह है।


यद्यपि अभी तक लोकसभा चुनाव में गठबंधन को लेकर मायावती ने कुछ भी नहीं बोला है, तथापि जिस तरह से राजस्थान मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव के पहले मायावती ने अपनी माया दिखलाई है, ठीक उसी प्रकार लोकसभा चुनाव में भी बसपा की रणनीति कुछ खास हो सकती है क्योंकि मायावती प्रधानमंत्री बनने के सपने को मिटाना नहीं चाहेगी।
बहुजन समाज पार्टी का कांग्रेस से अलग होकर तीन राज्यों में चुनाव लड़ने का फैसला लोकसभा चुनाव 2019 के मद्देनजर विपक्षी एकता के लिए नुकसान देह ही हो सकता है।
फिलहाल कांग्रेस का पूरा ध्यान विपक्षी पार्टियों को एकजुट करके नरेंद्र मोदी को हराने में लगा हुआ है और वह घोषणा भी कर चुकी है कि यदि भाजपा के खिलाफ कोई पार्टी कांग्रेस से मिलकर गठबंधन बनाना चाहे तो कांग्रेस उसका स्वागत करेगी।


सूत्रों की माने तो कांग्रेस का प्रयास यह है कि वह उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र में सही ढंग से गठबंधन बना पाए ताकि बीजेपी को सत्ता में आने से रोक सके।
खासकर के प्रधानमंत्री पद के लिए चेहरा पेश करने के सवाल पर यह कहा जा सकता है कि कांग्रेस अभी इस स्थिति में नहीं है कि वह प्रधानमंत्री के लिए चेहरा साफ कर पाए क्योंकि विपक्षी दलों को एक साथ लाकर बीजेपी और नरेंद्र मोदी को हराना उसका प्रमुख एजेंडा है।
इस प्रकार कांग्रेस इस बार लोकसभा के चुनाव में अलग-थलग पड़ता दिख रहा है। उधर यूपी से अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस के साथ चुनाव लड़ने से इंकार किया है। अपने सहयोगी दलों की यह रणनीति कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में एक हाशिए पर लाकर खड़ा कर सकती है। इस प्रकार सोनिया के हाथ से सोने की चिड़िया निकलती नजर आ रही है।