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नवरात्र 2018, पहले दिन माता शैलपुत्री के दर्शन को उमड़ा आस्था का सैलाब

Patrika 2018-10-10 19:24:51

वाराणसी. शारदीय नवरात्र बुधवार से आरंभ हो गया। इसके साथ ही शिव की नगरी काशी में श्रद्धालु शक्ति की आराधना में लीन हो गए। लोगों ने व्रत रखा। इसमें से अधिकांश परिवा और अष्टमी (पहले और आठवें दिन) ही व्रत रखेंगे, लेकिन इस धार्मिक नगरी काशी में ऐसे लोगों की तादाद भी कम नहीं जो पूरे नवरात्र भर यानी नौ दिनों तक व्रत रखेंगे। इसमें भी कुछ लोग तो केवल जल का ही सेवन करते हैं। इस बीच लोगों ने घरों में घट स्थापन (कलश की स्थापना) की और कुछ पुरोहितों और कुछ लोगों ने खुद ही दुर्गा सप्तशती का पाठ भी शुरू कर दिया। उधर मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप के दर्शन-पूजन को वाराणसी के अलईपुरा मोहल्ले में मुंह अंधेरे से ही भक्तों की कतार लग गई। यह सिलसिला देर रात तक चलता रहा।

माता शैलपुत्री के दर्शन-पूजन के लिए जुटे आस्थावानों का आलम यह रहा कि सिटी रेलवे स्टेशन से लेकर पुराना पुल से होकर गुजरने वाली सड़क तक लंबी लाइन लगी रही। भोर से ही देवी के दरबार में जयकारे गूंजते रहे। तड़के मंगल बेला पर जगत जननी, मां भगवती का पंचामृत स्नान कराया गया। उसके बाद नूतन वस्त्र धारण कराके अड़हुल, दौना, कुंद, गुलाब के सुगंधित मालाओं से भव्य श्रृंगार हुआ। फिर माता रानी की महाआरती की गई। आरती के बाद दर्शन के लिए कपाट खोल दिए गए। माता के जयकारों से पूरा मंदिर परिसर गूंजता रहा। भक्तों ने माता समक्ष चुनरी, नारियल, माला-फूल प्रसाद अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की। दर्शनार्थियों में बनारस के अलावा आसपास के इलाकों के भक्त भी शामिल रहे।

देवी मंत्र
वन्दे वांच्छितलाभाय चंद्रार्धकृतशेखराम्‌। वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्‌ ॥

पौराणिक मान्यता

नवरात्रि के पावन पर्व पर देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा अर्चना की जाती है। देवी दुर्गा के पहले स्वरूप को ‘शैलपुत्री’ के नाम से जाना जाता हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम ‘शैलपुत्री’ पड़ा। इनका वाहन वृषभ है। इसलिए यह देवी वृषारूढ़ा के नाम से भी जानी जाती हैं। देवी ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है और बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है।

देवी का पहला नाम शैलपुत्री है, शैल का अर्थात शिखर। शास्त्रों में शैलपुत्री को पर्वत शिखर हिमालय की बेटी के नाम से जाना जाता है। लेकिन इसका योग के मार्ग पर वास्तविक अर्थ है, चेतना का सर्वोच्चतम स्थान। यानी जब ऊर्जा अपने चरम स्तर पर है, तभी आप इसका अनुभव कर सकते है इससे पहले कि यह अपने चरम स्तर पर न पहुंच जाए, तब तक आप इसे समझ नहीं सकते, क्योंकि चेतना की अवस्था का यह सर्वोत्तम स्थान है, जो ऊर्जा के शिखर से उत्पन्न हुआ है। जब किसी भी अनुभव या भावनाओं के शिखर तक पहुंचते हैं, तो दिव्य चेतना के उद्भव का अनुभव होता है। कारण यह चेतना का सर्वोत्तम शिखर है। शैलपुत्री का यही वास्तविक अर्थ है। शप्तशती में देवी को चेतना की अधिष्ठात्री भी कहा गया है।