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उत्तर भारत का एकमात्र सूर्य मंदिर, भगवान परशुराम ने की थी स्थापना

Eenadu India 2018-11-09 17:19:00
शिमला: नीरथ-रामपुर से 18 किलोमीटर दूर नीरथ गांव में सूर्य मंदिर है. पूरे उत्तर भारत में सूर्य देव का ये एकमात्र मंदिर है. मंदिर में नृत्य मगन गणेश, शिव-पार्वती और अन्य हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं जो प्राचीन हैं और कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं.

नीरथ सूर्य मंदिर.


शिमला: नीरथ-रामपुर से 18 किलोमीटर दूर नीरथ गांव में सूर्य मंदिर है. पूरे उत्तर भारत में सूर्य देव का ये एकमात्र मंदिर है. मंदिर में नृत्य मगन गणेश, शिव-पार्वती और अन्य हिन्दू देवी-देवताओं की मूर्तियां हैं जो प्राचीन हैं और कला की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं.


मंदिर के गर्भगृह में 3 फुट ऊंची और 4 फुट चौड़ी पाषाण सूर्य प्रतिमा है. सूर्य को सप्त अश्वों पर सवार दिखाया गया है. बाहरी दीवार पर बारह अवतार, लक्ष्मी नारायण, अष्ठ भुजाओं वाले गणेश और ब्रम्हा की मूर्तियां स्थापित हैं. मध्य भाग में चारों तरफ सूर्य की प्रतिमाएं और सिंह की प्रतिमाएं निर्मित हैं.

सूर्य मंदिर का निर्माण काल सातवीं शताब्दी के आसपास का है. इस मंदिर का उलेल्ख 1908 में मार्शल ने किया था. 1909 में जब एसएच फ्रेंक ने शिलालेखों को खोजने की कोशिश की तो वे सफल नहीं हुए. राहुल सांस्कृत्यान ने अपनी पुस्तक में इसका उलेल्ख किया है. माना जाता है कि इस सूर्य मंदिर की स्थापना परशुराम ने की थी.

जानकारों की मानें तो जब भगवान परशुराम ने अपने पिता के आदेश पर माता रेणुका का सिर धड़ से अलग कर दिया था. इसके बाद मातृ दोष से मुक्त होने के लिए उन्हें हिमालय के तराई वाले क्षेत्रों में पांच मंदिरों की स्थापना करने को कहा गया था. इसके बाद परशुराम अपने हज़ारों शिष्यों के साथ हिमालय की ओर निकल पड़े थे. उनके ये शिष्य शैव, शक्ति और दत्तात्रेय थे.

इसके बाद परशुराम ने नीरथ में सूर्य नारायण मंदिर, करसोग में कामाक्षा देवी मंदिर और मवेल महादेव, दत्तनगर में दत्तात्रे स्वामी और निरमंड में अंबिका माता मंदिर की स्थापना की थी. पौराणिक किवदंतियों के अनुसार मंदिरों में दैनिक गतिविधियों का संचालन औऱ आराध्य देव की वैदिक पद्धति से पूजा अर्चना करवाने के लिए परशुराम ने दक्षिण भारत से ब्राह्मण परिवारों को यहां लाकर बसाया था.

मंदिर में काम करने के बदले इन्हे मंदिर की भूमि दान दी गई थी. इसका प्रमाण मंदिर के प्रवेश द्वार के ठीक सामने आंगन में बना चबूतरा है. माना जाता है कि परशुराम ने इस चबूतरे पर बैठकर नीरथ के ब्राह्मणों को भूमि दान में दी थी. मंदिर में मौजूद ताम्रपत्र पर लिखित लिपि भी इन तथ्यों की पुष्टि करती है. पांडवों ने भी अज्ञातवास के दौरान इस मंदिर का अधूरे निर्माण कार्य को पूरा किया था.

1810 में गोरखा सेनापति काजी अमर सिंह थापा ने बुशहर रियासत की राजधानी रामपुर को अपने अधिकार में ले लिया था. बुशहर के राजा महेंद्र सिंह नाबालिग थे. रियासत के वजीर उन्हें किन्नौर लेकर चले गए. गोरखों ने रामपुर में तबाही मचा दी थी. सारे रियासती अभिलेख जलाकर राख कर दिए.

सूर्य नारायण मंदिर नीरथ भी गोरखा आक्रमणकारियों से नहीं बच सका. गोरखों ने मंदिर अन्न भंडारण गृह नष्ट कर दिए. गोरखा मंदिर के शिखर पर लगा स्वर्ण कलश चुरा कर ले गए. लूटपाट के दौर में मंदिर से बहुत सा सोना-चांदी लूट कर ले गए थे.