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राजस्थान: तारबंदी के शिकार किसानों के साथ नेताओं का सियासी खेल शुरू

Zee News Hindi 2018-12-04 18:47:48
यहां के किसान आजादी के समय से ही पुश्तैनी रूप से खेती करते आ रहे हैं.

हरनेक सिंह/श्रीगंगानगर: चुनाव में हर पार्टी के नेता वादे तो बहुत करते है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद जनता से किए वादे पुरे कितने होते है. अगर ये देखना और समझना हो तो श्रीगंगानगर जिले की भारत-पाक अंतरराष्ट्रीय सीमा पर जाकर बखूबी समझ आ जाएगा. बॉर्डर पर बसे किसानो से यहां के नेता हर चुनाव में जो वादा करके वोट लेते है वो वादे हमारे जनप्रतिनिधि पिछले 40 सालो में पूरा नहीं कर पाए है. 

राजस्थान के सीमांत जिले श्रीगंगानगर में भारत-पाक सरहद के हिंदुमलकोट और खखां इलाके के किसान अपनी आन-बान के लिए जाने जाते हैं. इनकी जिंदगी सरहद के दहशत के साये में पलती-बढ़ती है. सरहदी गांवों के इन किसानों की खेती-बाड़ी सरहद पर तारबंदी के पार भी है. जहां ये किसान आजादी के समय से ही पुश्तैनी रूप से खेती करते आ रहे हैं. 

बोर्डर के गांव में बसे ये किसान तारबंदी के पार जीरो लाइन पर स्थित अपने खेतों में लंबे समय से फसल उगाकर अपना व अपने परिवार का जीवन पालन-पोषण कर रहे हैं. लेकिन किसानों के सामने उनकी जमीन सरहद की तारबंदी के इर्द-गिर्द होना ही सबसे बड़ा संकट बन चुका है. तारबंदी के अंदर जमीने आने से यहां के किसान बहुत परेशान है. सुरक्षा कारणों के चलते बीएसएफ द्वारा यहां बहुत सावधानी रखी जाती है. ऐसे में किसानो को तारबंदी के उस और की जमीनों पर खेती करने में बहुत दिक्क्तों का सामना करना पड़ता है.

तारबंदी के उस पार की जमीने भले ही यहाँ के किसानो को जिन्दा रहने के लिए सहारा है, लेकिन तारबंदी में आई जमीन से उपजी मुश्किलों से यहां के किसान उचित राहत चाहते है, मगर जितने के बाद कोई भी जनप्रतिनिधि इस समस्या पर ध्यान नहीं देता है. 

ऐसा ही कुछ खकां गांव की गुरप्रीत कौर के साथ हो रहा है. इनकी जमीन तारबंदी के उसपार है. तारबंदी में आई जमीन पर सरकार द्वारा खेती न करने देने पर गुरप्रीत कौर ने भावुक होकर कहा कि खाने के लिए कुछ है नहीं ,बीएसएफ वाले खेती करने के लिए उस पार जाने नहीं देते, बड़ी तंगी है सरकार भी हमारी बात नहीं सुनती. हमारे बच्चे बड़ी मुश्किल से गुजारा कर रहे है. वोट लेने के लिए नेता लोग भागते है. कोई कहता है हमें वोट दो, तो कोई कहता है हमें वोट दो. लेकिन काम की कोई सुनवाई नहीं होती.

यह एरिया सादुलशहर विधानसभा में आता है. ऐसे में जनप्रतिनिधि हर चुनाव में बॉर्डर पर बसे लोगो से तारबंदी की जमीन का अधिग्रहण करने का वायदा करके इनके वोटो के सहारे विधानसभा-लोकसभा तो पहुंच जाते है. मगर फिर अपना वादा पांच साल तक भूल जाते है. ऐसे में चुनाव का मौसम है तो राजनितिक पार्टियों के उम्मीदवार फिर से बॉर्डर पर बैठे किसानो के बीच वोट लेने के लिए पहुंच रहे है. मगर भाजपा उम्मीदवार किसानो की इस समस्या को केंद्र का मुद्दा बताकर समाधान से पल्ला झाड़ रहे है. वहीं निर्दलीय प्रत्याशी बॉर्डर के किसानो के लिए तारबंदी में आई जमीन का समाधान करने के तरीके बताकर समस्या का हल निकालने की बात कह रहे है.

ये हालात महज एक-दो किसानो के नहीं है बल्कि श्रीगंगानगर जिले के बोर्डर पर बसे दर्जनों गांवों के किसानों के है. मगर आजीविका का एक मात्र सहारा छिन जाने के कारण अब इन परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट बढ़ता जा रहा है. तारबंदी में आई किसानो की जमीन आने से परेशान किसान तो यह तक कह रहे है की उन्हें गोली मार दी जाये ताकि रोज-रोज का झंझट ही खत्म हो जाये. मगर सत्ता के लोगो के लिए इनकी समस्या केवल वोट बैंक है.