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स्वच्छ भारत मिशन खुले में शौच से मुक्त भारत के लक्ष्य प्राप्ति की ओर

Shramjeevi Journalist 2019-01-10 00:00:00

नई दिल्ली: स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के अंतर्गत 5.4 लाख से अधिक गांव और 585 जिले खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित किए गए हैं। अब तक 27 राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों ने स्वयं को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया है। ग्रामीण भारत में 9 करोड़ से ऊपर शौचालय बनाए गए हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय ग्रामीण स्वच्छता कवरेज आज 98 प्रतिशत से अधिक हो गया है, जबकि यह 2014 में 39 प्रतिशत था। इस प्रगति का सत्यापन स्वतंत्र रूप से व्यापक तीसरे पक्ष के राष्ट्रीय वार्षिक ग्रामीण स्वच्छता सर्वेक्षण 2017-18 में किया गया है। विश्व बैंक समर्थित यह सर्वेक्षण 6 हजार से अधिक गांवों के 90,000 परिवारों में किया गया। इसमें ग्रामीण शौचालय उपयोग 93.4 प्रतिशत पाया गया। दो अन्य स्वतंत्र सर्वेक्षण 2017 में भारतीय गुणवत्ता परिषद द्वारा तथा 2016 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन द्वारा किए गए थे। इन दोनों सर्वेक्षणों में ग्रामीण शौचालयों का उपयोग का प्रतिशत क्रमशः 91 प्रतिशत और 95 प्रतिशत था। स्वच्छ भारत मिशन अक्टूबर, 2019 तक खुले में शौच से मुक्त भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने की राह पर है।

मंत्रालय ने इस संदर्भ में कुछ वैसी मीडिया रिपोर्टों को संज्ञान में लिया है, जिसमें सर्वेक्षण करने के तौर-तरीके और तकनीकी रूप से दोषपूर्ण सर्वेक्षणों का हवाला दिया गया है। “ग्रामीण उत्तर भारत में खुले में शौच में परिवर्तनः 2014-2018” शीर्षक से हाल में किया गया अध्ययन पाठकों को पूरी तरह भ्रमित करता है और जमीनी वास्तविकता को नहीं दिखाता है। रिपोर्ट में पाए गए कुछ दोष और अंतर इस प्रकार हैं-

सांख्यिकी रूप से महत्वहीन और गैर-प्रतिनिधि मूलक नमूनाः रिपोर्ट में चार राज्यों – राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार तथा उत्तर प्रदेश में किए गए सर्वेक्षण का हवाला दिया गया है। सर्वेक्षण में लगभग पांच करोड़ परिवारों तथा 2.3 लाख गांव की तुलना में केवल 157 गांवों में 1558 परिवारों के सर्वेक्षण का हवाला दिया गया है। सर्वे में राजस्थान के 33 जिलों में से केवल 2 जिले, बिहार के 38 जिलों में केवल 3 जिले, उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में 3 जिले तथा मध्य प्रदेश के 52 जिलों में से 3 जिलों का ही हवाला दिया गया है और इन राज्यों में स्वच्छता की स्थिति के बारे में काल्पनिक और बढ़ा-चढ़ाकर निर्णय दिया गया है। स्वच्छ भारत मिशन विश्व में व्यवहार परिवर्तन संबंधी सबसे बड़ा कार्यक्रम है, इसलिए छोटे नमूने के आधार पर काल्पनिक परिणाम देना विस्तृत विवरणों की अनदेखी करना है। ऐसे सर्वेक्षणों में गलतियों की संभावना काफी अधिक होती है।

सर्वेक्षण के समय पर स्पष्टता का अभावः रिपोर्ट में बार-बार कहा गया है कि सर्वेक्षण 2018 के अंत में किया गया, लेकिन जानबूझकर निश्चित तिथि नहीं बताई गई है। यह काफी भ्रामक है, क्योंकि स्वच्छ भारत मिशन काफी अधिक तेजी से बढ़ने वाला कार्यक्रम है और पिछले वर्ष मासिक आधार पर स्वच्छता की स्थिति में परिवर्तन आया है। वास्तव में इस सर्वेक्षण में उदयपुर में किए गए एक अध्ययन को शामिल किया है, जो अध्ययन काफी पुराना (अप्रैल-जून, 2017 का) है।

नये परिवारः 2018 के सर्वेक्षण में 2014 की तुलना में 21 प्रतिशत नये परिवार जोड़े गए हैं। इस तरह के छोटे से सर्वेक्षण में कुल 21 प्रतिशत नये परिवारों को शामिल करने (राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में एक/तिहाई) से परिणाम बदल जाएंगे और सर्वेक्षण तुलना योग्य नहीं रह जाएगा।

दोषपूर्ण प्रश्नावलीः महत्वपूर्ण प्रश्न शौचालयों के स्वामित्व का है न कि शौचालय तक पहुंच। वास्तव में कुछ परिवारों में शौचालय साझा किए जाते हैं, कुछ परिवारों में शौचालय नहीं होने पर सामुदायिक शौचालय और सार्वजनिक शौचालयों का उपयोग किया जाता है। अध्ययन में इस्तेमाल की गई प्रश्नावली में इसे कवर नहीं किया गया है।

दबाव परिभाषा की कम समझः रिपोर्ट में यह साबित करने का प्रयास किया गया है कि स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत लोगों पर शौचालय बनाने और शौचालय का इस्तेमाल करने के लिए दबाव डाला गया। स्वच्छ भारत मिशन मजबूती के साथ सकारात्मक व्यवहार परिवर्तन का समर्थन करता है और मंत्रालय इसके क्रियान्वयन में किसी भी तरह के दबाव को गंभीरता से लेता है। दुर्भाग्यवश, रिपोर्ट दबाव और सकारात्मक सामुदायिक कार्रवाई के बीच अंतर करने में विफल है। यह दिखाता है कि सर्वेक्षण करने वाले और विश्लेषण करने वालों के बीच स्वच्छता को लेकर सामुदायिक दृष्टिकोण की समझदारी सीमित है।

उपरोक्त सर्वेक्षण में अनेक खाइयों को देखते हुए मंत्रालय प्रमुख से यह मानता है कि गलतियों, असंगतियों तथा पूर्वाग्रह प्रेरित अध्ययनों के आधार पर बनी रिपोर्टें पाठकों को भ्रमित करती हैं।