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Mothers day: बेटे को सफल बनाने के लिए मां ने छोड़ी बैंक की नौकरी, एक बेटा आइआरएस, दूसरा प्रोफेसर

Patrika 2019-05-12 17:34:56

जसराज ओझा. भीलवाड़ा।

जरूरी नहीं है कि परीक्षा में सर्वाधिक अंक हो तो ही जीवन में सफलता मिलेगी। यदि परिवार में मां की जिद और प्रेरणा मिले तो फेल बच्चा भी बड़े मुकाम पर पहुंच सकता है। ऐसी ही कहानी है भीलवाड़ा के उपनगर सांगानेर की उषादेवी वैष्णव की। इनके दो बेटे हैं। एक आइआरएस होकर अभी सीजीएसटी में सहायक आयुक्त है तो दूसरा आदित्य वैष्णव बिजौलियां कॉलेज में भूगोल के प्रोफेसर है।

 

सांगानेर निवासी उषा वैष्णव की पाली के सहकारी बैंक में कार्यरत थी। वर्ष 1999 की बात है। बड़ा बेटा अनिरुद्ध वैष्णव छठी कक्षा में गणित व अंग्रेजी विषय में फेल हो गया था। दूसरा बेटा भी पढ़ाई कर रहा था। अनिरुद्ध के पिता भंवरदास वैष्णव स्कूल में प्रिंसीपल थे। उनका पाली से भीलवाड़ा तबादला हो गया, जबकि मां की नौकरी पाली में ही थी और दोनों बेटे भीलवाड़ा ही पढ़ रहे थे। मां ने अपने बच्चों की पढ़ाई की खातिर बैंक की नौकरी छोड़ दी, क्योंकि अगले साल बड़े बेटे की दसवीं की परीक्षा थी। उसकी पढ़ाई की खातिर वह बैंक की नौकरी छोड़कर अपने गांव आ गई और दोनों बच्चों को घर पर ही पढ़ाने लगी। उस वक्त मां रात-रात भर जागती थी, ताकि बच्चे पढ़ते रहे। यही मां का संघर्ष काम आया और आज दोनों बेटे अच्छे मुकाम पर है।


मां के संघर्ष से आगे बढ़ गए अनिरुद्ध

सरकारी स्कूल में पढ़ने के बाद सीजीएसटी में सहायक आयुक्त बने अनिरुद्ध वैष्णव छठी कक्षा में गणित व अंग्रेजी में फेल हो गए थे। जब मां ने उन्हें पढ़ाया तो कक्षा में टॉप किया। दसवीं में 76 व 12 वीं में 69.23 प्रतिशत अंक आए। अंक ज्यादा नहीं थे तो नौकरी मिलना आसान नहीं था। उन्होंने मार्केटिंग की नौकरी की और निजी स्कूलों में पढ़ाया अनिरुद्ध ने बताया कि मां की प्रेरणा से उन्होंने अपने ऊपर कभी भी कम अंकों को हावी नहीं होने दिया और पढ़ाई जारी रखी। सबसे पहले कस्टम इंस्पेक्टर की नौकरी मिली। इसके बाद आरएएस बन गए। सफलता का सफर यहां नहीं रुका और वर्ष 2015 में सिविल सेवा के परिणाम में ऑल इंडिया 90 वीं रैंक मिली और आईआरएएस बन गए।

कभी प्राइवेट स्कूल में नहीं पढ़े

अनिरुद्ध बताते हैं कि आरएएस बनने के बावजूद उन्होंने आइएएस के लिए तैयारी में कमी नहीं रखी। अभी प्राइवेट स्कूलों का बोलबाला है, लेकिन उन्होंने कभी प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई नहीं की। पहले सांगानेर के स्कूल फिर राजेंद्र मार्ग और एमएलवी कॉलेज से ही पढ़ाई की। छोटे से गांव और सरकारी स्कूल में पढ़कर आइआरएस बनना। लेखक, थियेटर आर्टिस्ट और ब्लॉगर के रूप में पहचान बनाने में वे अपनी मां का सहयोग मानते हैं।

यही मेरी कमाई है..
उषादेवी वैष्णव ने मदर्स डे पर पत्रिका को बताया कि मैं, बैंक की नौकरी कमाने के लिए कर रही थी। मुझे मेरी कमाई मेरे बेटों में नजर आई। एेसे में मैने बैंक की नौकरी छोड़ दी और अपने बेटों की पढ़ाई पर ध्यान दिया। दोनों बेटे पढ़ाई में औसत थे। कोई 99.99 प्रतिशत अंक नहीं थे। लेकिन मैने अंकों को जरूरी नहीं समझा। उनके लक्ष्य तय किए और उनका साथ दिया। आज दोनों बेटे मुकाम पर है। यही मेरी कमाई है। अनिरुद्ध व आदित्य के पिता भंवरदास वैष्णव कहते है कि उषा ने जो सफलता की कहानी अपने दम पर लिखी है, वो मिसाल है, हम सब को उस पर नाज है।

चुनौतियां ही मजबूत बनाती हैं
सहायक आयुक्त वैष्णव का कहना है कि चुनौतियां ही मजबूत बनाती हैं, इसलिए चुनौतियां से घबराने की जरूरत नहीं ऊंची मंजिल पर पहुंचने के लिए लगातार मेहनत की जरूरत पड़ती है इसलिए एक-दो बार में सफलता नहीं मिलने पर हार नहीं माननी चाहिए। साथ ही कम अंक या केवल निजी स्कूल में पढऩा ही महत्वपूर्ण नहीं होता है। जरूरी है कि जो भी काम कर रहे हैं उस पर फोकस होना जरूरी है।