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अपराध का चेहरा | जनता से रिश्ता | Janta Se Rishta | News Paper | Raipur Chhattisgarh

Janta Se Rishta 2019-05-15 16:21:34

जनता से रिश्ता वेबडेस्क:-  जम्मू-कश्मीर के बांदीपोरा जिले में तीन साल की बच्ची से बलात्कार की घटना ने फिर यही सोचने पर मजबूर किया है कि एक समाज के सामूहिक स्वरूप में हम कितने सभ्य हो पाए हैं! घटना के मुताबिक पीड़ित बच्ची के पड़ोस में ही रहने वाले एक युवक ने उसे टॉफी देकर बहलाया और पास के एक स्कूल में ले जाकर उससे बलात्कार किया। हालांकि इस मामले में पुलिस तुरंत सक्रिय हुई और हर स्तर पर जरूरी कार्रवाई की। लेकिन चूंकि बलात्कार के खिलाफ अब लोग मुखर होकर सामने आने लगे हैं, इसलिए जब मामला सामने आया तो स्थानीय लोगों के भीतर आक्रोश पैदा हुआ और वे इसके विरोध में सड़क पर उतर आए। इसके बाद हुई पत्थरबाजी और हिंसा में सैंतालीस सुरक्षाकर्मी घायल हो गए। इसमें कोई शक नहीं कि एक मासूम बच्ची के खिलाफ जैसा अपराध हुआ, उस पर किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के भीतर दुख और गुस्सा पैदा होगा। किसी भी जागरूक समाज में ऐसे अपराध पर लोगों के भीतर विरोध और प्रतिक्रिया एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। लेकिन अगर यह विरोध बेलगाम होकर पुलिस से सीधे टकराव और कानून-व्यवस्था के लिए चुनौती के रूप में सामने आए तो इससे अपराध की जांच में गैरजरूरी देरी हो सकती है।

लोगों के गुस्से और दुख को समझा जा सकता है, मगर आरोपी को देश के कानून के तहत ही सजा दिलाई जा सकती है। देश में इस मसले पर सख्त कानून मौजूद हैं और पुलिस को इस अपराध के आरोपी को कानूनन कड़ी सजा दिलानी चाहिए। इस मामले में एक और शर्मनाक पहलू यह है कि आरोपी युवक के स्कूल के प्रिंसिपल को एक जागरूक नागरिक होने के नाते जहां जांच और कार्रवाई में सहयोग करना चाहिए था, वहां उसने युवक का फर्जी जन्म प्रमाण पत्र जारी कर यह साबित करने की कोशिश की कि वह अभी नाबालिग है। जब पुलिस ने अलग से आरोपी की मेडिकल जांच कराई तब वह बालिग निकला। जाहिर है, स्कूल के प्रिंसिपल ने एक तरह से आरोपी को बचाने की कोशिश की। समाज में किसी भी व्यक्ति का ऐसा रवैया ही वह असली वजह है जिसके चलते आपराधिक मानसिकता के लोगों को शह मिलती है और वे हमारे बीच सभ्यता का पर्दा ओढ़े पलते-बढ़ते रहते हैं, जिसका खमियाजा कभी भी किसी को उठाना पड़ सकता है। गौरतलब है कि कुछ हफ्ते पहले बांदीपोरा में ही एक व्यक्ति ने अपनी बेटी से बलात्कार किया था। पिछले साल कठुआ में आठ साल की बच्ची से बलात्कार और हत्या की त्रासद घटना की स्मृतियों से लोग अब भी नहीं उबरे हैं। ऐसे में अगर कश्मीर की लड़कियां अगर अपनी सुरक्षा को लेकर चिंता जाहिर करती हैं तो यह स्वाभाविक है।

दरअसल, बच्चों के खिलाफ यौन दुर्व्यवहार के लगभग सभी मामलों में यह एक अहम तथ्य है कि छोटे बच्चे चूंकि समझ और शारीरिक क्षमता के स्तर पर कमजोर हालत में होते हैं, अपने विरुद्ध कुछ गलत होने पर प्रतिरोध नहीं कर पाते हैं। इसलिए यौन कुंठा से ग्रस्त और आपराधिक मानसिकता वाले लोग आसानी से उन्हें निशाना बनाते हैं। अनेक अध्ययनों में यह तथ्य सामने आ चुका है कि छोटे बच्चों के यौन-उत्पीड़न की घटनाओं में लिप्त ज्यादातर लोग परिचित और यहां तक कि संबंधी ही होते हैं। आपराधिक मानसिकता वाले और यौन-कुंठित लोगों को अपने ऊपर किसी का भरोसा बनाए रखना या नैतिक बंधन का खयाल रखना जरूरी नहीं लगता। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हर स्तर पर जरूरी कानूनी सख्ती बरती जाए और इसके साथ-साथ परिवारों की सजगता, बच्चों को अपने साथ अच्छे-बुरे बर्ताव की पहचान का प्रशिक्षण और सामाजिक विकास योजनाओं पर भी समान रूप से जोर दिया जाए।