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संविधान बदलने का समय

Divya Himachal 2019-05-16 00:00:00

राजनीतिक रणनीतिकार

भावार्थ यह कि सत्तासीन दल के ऐसे सांसद जो मंत्रिपरिषद में नहीं हैं, संसद में कुछ नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री यदि मजबूत हो, तो वह संसद और अपने दल ही नहीं, अपनी मंत्रिपरिषद की भी परवाह नहीं करता। प्रधानमंत्री और उसके दो-तीन विश्वस्त साथी ही निर्णय लेते हैं कि संसद में कौन सा बिल पेश किया जाए अर्थात एक व्यक्ति अथवा उसका गुट पूरा देश चलाता है और संसद, पार्टी तथा मंत्रिपरिषद सभी बेमानी हो जाते हैं। संसदीय व्यवस्था में कार्यरत प्रधानमंत्री असल में लोकतांत्रिक ढंग से चुना गया तानाशाह है। प्रधानमंत्री मोदी ने अकेले ही निर्णय ले लिया कि इस देश को योजना आयोग की जरूरत नहीं है…

देश को स्वतंत्रता मिलने के बाद संविधान सभा का गठन हुआ, जिसने विश्व के कई संविधानों का अध्ययन किया और अपने देश के लिए संविधान बनाया। संविधान लागू हो जाने पर भारतवर्ष गणतंत्र बन गया। हमारा संविधान मूलतः ब्रिटेन में प्रचलित संसदीय व्यवस्था पर आधारित है। ज्ञातव्य है कि अब तक इसमें 124 संशोधन हो चुके हैं। इन संशोधनों और उनके प्रभावों के बारे में आम जनता को ज्यादा जानकारी नहीं है। इसलिए यह आवश्यक है कि इनके बारे में बात की जाए। हम यहां सिर्फ चार संशोधनों और उनके प्रभावों के बारे में सीमित बात करेंगे। यह लेख दिव्य हिमाचल के चेयरमैन भानु धमीजा की प्रसिद्ध पुस्तक ‘व्हाई इंडिया नीड्स दि प्रेजिडेंशियल सिस्टम’ से प्रेरित है। 24वें संविधान संशोधन के माध्यम से ‘संसद की सर्वोच्चता’ स्थापित की गई। यानी संसद को कैसा भी कानून बनाने की स्वतंत्रता मिल गई।

इसी संशोधन में एक प्रावधान यह भी किया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की ‘सलाह’ के अनुसार काम करेंगे। बाद में 42वें संशोधन में इस प्रावधान को और भी स्पष्ट कर दिया गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह मानने तथा संसद द्वारा पारित बिलों को स्वीकृति देने के लिए ‘बाध्य’ हैं। संविधान के 38वें संशोधन से राष्ट्रपति और राज्यपालों को अध्यादेश जारी करने का अधिकार मिला। परिणामस्वरूप संसद और विधानसभाओं की छुट्टी के दिनों में केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को कोई भी अध्यादेश लाने की छूट मिल गई। 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारतवर्ष में निर्देशक सिद्धांत अस्तित्व में आए और उन्हें मौलिक अधिकारों के मुकाबले वरीयता दे दी गई। बयालीसवां संविधान संशोधन बहुत व्यापक था, जिसमें संसद और विधानसभाओं की अवधि पांच वर्ष से बढ़ा कर छह वर्ष कर दी गई। संसद में कोरम की आवश्यकता समाप्त कर दी गई। यानी यदि संसद में सिर्फ एक ही सदस्य उपस्थित हो और वह संसद में पेश किए गए किसी बिल पर अपनी सहमति दे, तो उस बिल को पूरे सदन द्वारा पास किया मान लिया जाएगा।

सर्वोच्च न्यायालय से राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित बिलों की सुनवाई का अधिकार छीन लिया गया और उच्च न्यायालयों से संसद द्वारा पारित बिलों की सुनवाई का अधिकार वापस ले लिया गया। इसके अतिरिक्त सर्वोच्च न्यायालय से चुनाव संबंधी याचिकाओं की सुनवाई का अधिकार भी छिन गया। संयोग यह रहा कि उसके बाद सरकार बदल गई और नई सरकार ने 42वें संविधान संशोधन की बहुत सी धाराओं को निरस्त कर दिया तथा राष्ट्रपति को इतनी सी छूट दे दी कि वह संसद द्वारा पारित किसी बिल को संसद के विचारार्थ वापस भेज सकते हैं, लेकिन यदि संसद उसे फिर से पास कर दे, तो राष्ट्रपति को उस पर सहमति देनी ही होगी। इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय को संविधान के मूल स्वरूप को बरकरार रखने की स्वतंत्रता भी वापस दे दी गई। 52वें संविधान संशोधन ने राजनीतिक दलों के मुखिया को अपने दल के अंदर सर्वशक्तिमान बना डाला, जिसने पार्टी सुप्रीमो की अवधारणा को जन्म दिया। अब यदि 24वें, 38वें, 42वें और 52वें संविधान संशोधनों को मिलाकर इनके समग्र प्रभाव को देखें, तो भारतीय जनतंत्र की एक अलग ही तस्वीर नजर आती है। चौबीसवें संविधान संशोधन ने संसद को असीम शक्तियां दे दीं, यहां तक कि संसद के पास यह शक्ति आ गई है कि वह पूरा संविधान बदल दे, संविधान को ही निरस्त कर दे, देश में संसद के कानून द्वारा स्थापित किसी भी संस्था को समाप्त कर दे। संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार संसद सर्वोच्च है, लेकिन यह समझना रुचिकर होगा कि क्या संसद सचमुच सर्वोच्च है? क्या संसद सचमुच इन शक्तियों का उपभोग करती है? बावनवें संविधान संशोधन ने राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के लिए पार्टी आलाकमान के निर्देश मानना अनिवार्य कर दिया। पार्टी का अध्यक्ष ही सर्वेसर्वा हो गया। एक व्यक्ति या एक परिवार पार्टी का आलाकमान बन गया और उनके आदेश मानना पार्टी के कार्यकर्ताओं की ही नहीं, बल्कि वरिष्ठतम नेताओं तक की विवशता हो गई। पार्टी अध्यक्ष के अलावा हर दूसरा व्यक्ति अध्यक्ष का गुलाम हो गया। संसद में बिल पर वोटिंग के समय पार्टी ह्विप के कारण पार्टी की विचारधारा के अनुसार बिल के पक्ष या विपक्ष में वोट देना सांसदों की मजबूरी हो गई। इसका असर यह हुआ कि वोट की प्रासंगिकता ही समाप्त हो गई, क्योंकि वोटिंग से पहले ही पता होता था कि संसद में पेश किए बिलों पर पक्ष और विपक्ष में कितने-कितने वोट पड़ेंगे। सत्तासीन दल के पास चूंकि बहुमत होता है, इसलिए सरकार द्वारा पेश हर बिल का कानून बन जाना भी एक औपचारिकता हो गई।

यानी विपक्ष की प्रासंगिकता समाप्त हो गई, क्योंकि विपक्ष न तो कोई बिल पास करवा सकता है, न संशोधित करवा सकता है और न रुकवा सकता है। विपक्ष की बात तो छोडि़ए, सत्तासीन दल का भी कोई ऐसा सदस्य जो मंत्री न हो, अगर सदन में कोई बिल पेश करे, तो उसे निजी बिल माना जाता है और संसद का रिकार्ड बताता है कि सन् 1970 के बाद से आज तक एक भी निजी बिल पास नहीं हुआ है। यानी केवल मंत्रिपरिषद के पेश किए बिल ही कानून बन पाते हैं। भावार्थ यह कि सत्तासीन दल के ऐसे सांसद जो मंत्रिपरिषद में नहीं हैं, संसद में कुछ नहीं कर सकते।

प्रधानमंत्री यदि मजबूत हो, तो वह संसद और अपने दल ही नहीं, अपनी मंत्रिपरिषद की भी परवाह नहीं करता। प्रधानमंत्री और उसके दो-तीन विश्वस्त साथी ही निर्णय लेते हैं कि संसद में कौन सा बिल पेश किया जाए अर्थात एक व्यक्ति अथवा उसका गुट पूरा देश चलाता है और संसद, पार्टी तथा मंत्रिपरिषद सभी बेमानी हो जाते हैं। संसदीय व्यवस्था में कार्यरत प्रधानमंत्री असल में लोकतांत्रिक ढंग से चुना गया तानाशाह है। प्रधानमंत्री मोदी ने अकेले ही निर्णय ले लिया कि इस देश को योजना आयोग की जरूरत नहीं है। मोदी ने अकेले ही निर्णय लिया कि नोटबंदी होनी चाहिए और 1000 और 500 के नोट रद्दी हो गए। अकेला प्रधानमंत्री इतना शक्ति संपन्न है कि वह पूरे देश को किसी भी दिशा में हांक सकता है। इस प्रकार हमारा अपना संविधान ही संविधान को नष्ट करके नागरिक अधिकारों को सीमित कर रहा है। यह संविधान ही संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करके भ्रष्टाचार बढ़ा रहा है। इसे पूरी तरह से बदल देना समय की आवश्यकता है, वरना हमारे देश में कभी सच्चा लोकतंत्र नहीं आ पाएगा।

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