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यौन या अन्य उत्पीडऩ से निपटने के लिए यूपी में नहीं हैं विशाखा समितियां हाई कोर्ट नाराज

Patrika 2019-05-30 18:37:39

अनिल के. अंकुर
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के राज्य सूचना आयोग में महिलाओं के उत्पीडन के मामलों की जांचों के लिए आतंरिक परिवाद समिति ीं बनाए जाने की जगह बहानेबाजी करने पर हाई कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए यूपी के सूचना आयोग और मुख्य
सूचना आयुक्त की जमकर लताड़ लगाई है द्य

जस्टिस देवेन्द्र कुमार अरोड़ा और जस्टिस अलोक माथुर की बेंच ने लखनऊ स्थित समाजसेविका और आरटीआई कार्यकत्री उर्वशी शर्मा द्वारा अधिवक्ता शीतला प्रसाद त्रिपाठी और सौरभ कुमार श्रीवास्तव के मार्फत दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए उर्वशी के अधिवक्ता , शासन के स्थाई अधिवक्ता और सूचना आयोग और मुख्य सूचना आयुक्त के अधिवक्ता शिखर आनंद को सुनने के बाद सूचना आयोग को 24 घंटे का समय देते हुए सुप्रीम कोर्ट के द्वारा विशाखा मामले में दिए गए निर्देशों और महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीडन ( निवारण प्रतिषेध एवं प्रतितोष ) अधिनियम 2013 की धारा 4 के
अनुपालन में आयोग में आतंरिक परिवाद समिति गठित करने के सम्बन्ध में की गई कार्यवाही पर जबाब माँगा है और मामले को सुनवाई के लिए आज फिर सूचीबद्ध किया है द्य

विपक्षी अधिवक्ता शिखर आनंद द्वारा दलील दी गई कि इस मामले में आयोग ने साल 2016 में शासन को पत्र लिखकर कुछ बिन्दुओं पर स्पष्टीकरण मांगे गए हैं और यह भी बताया गया कि आयोग ने अभी तक आतंरिक परिवाद समिति का गठन
नहीं किया है द्य सूचना आयोग की इस बहानेबाजी से नाराज जस्टिस देवेन्द्र कुमार अरोड़ा और जस्टिस अलोक माथुर की बेंच ने महिला अधिकारों के प्रति उदासीन रवैया रखने पर सूचना आयोग को जमकर लताड़ा और व्यवस्था दी कि आयोग एक स्वायत्त संस्था है और इसीलिये आयोग द्वारा महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीडन ( निवारण प्रतिषेध एवं प्रतितोष ) अधिनियम 2013 के प्राविधानों का अनुपलान करने की अनिवार्यता है और यह भी कि आयोग को इस
सम्बन्ध में शासन से किसी भी प्रकार के स्पष्टीकरण को मांगने की आवश्यकता नहीं है द्य


उर्वशी के अधिवक्ता शीतला प्रसाद त्रिपाठी और सौरभ कुमार श्रीवास्तव ने बताया कि आयोग में महिलाओं के अधिकारों के संरक्षण के लिए लम्बे समय से प्रयत्नशील समाजसेविका उर्वशी इससे पहले साल 2016 में भी उनके मार्फत इस मामले को लेकर हाई कोर्ट गईं थीं द्य तब हाई कोर्ट ने यह माना था कि आयोग इस मामले में खुद संजीदा होकर कार्यवाही करेगा और उर्वशी को निर्देश दिया था कि वे इस मामले में आयोग को पत्र लिखकर दें लेकिन जब उर्वशी द्वारा बार-बार पत्र भेजने पर भी आयोग ने कार्यवाही नहीं की तो यह मामला फिर से हाई कोर्ट आ गया है

"Internal Complaints Committee". The details for constituting
the Committee has been provided in the Act, 2013 itself.
Shikhar Anand, Counsel for respondents no.2 and 3
has placed before us a copy of the letter dated 01.06.2016,
whereby certain clarifications have been sought by the
Information Commissioner from the State Government. It is
also admitted that till date, the Committee as mandated in 2013
Act has not been constituted.

Needless to say that U.P. State Information Commission being
an autonomous body is obliged to follow the provisions of 2013
Act and constitute a Committee and in this regard, there is no
need to seek any permission or clarification from the State
Government.