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बदल गई है,सिर्फ रेल या फिर हम भी

MomEspresso Hindi 2019-07-12 11:51:14

  अरे वाह आज तो बड़ी आसानी से ट्रेन में चढ़ गई,थोड़ा देर तक रुकी, वरना तो समझ ही नहीं आता कि सामान चढायूँ या  खुद चढूं। चलो राहुल को फोन कर देती हूं कि मैं ठीक से बैठ गई वरना चिंता करता रहेगा, कितना कह रहा था कि मैं छोड़कर आऊंगा, यह क्या बात हुई अब मैं कोई छोटी बच्ची थोड़े ही ना हूँ कि खुद नहीं जा सकती आजकल के बच्चे भी ना जरा सा बड़ा होते खुद को बाप समझने लगते हैं।

मैं मन ही मन खुद से ही बातें किये जा रही थी कि तभी सामने वाली वर्थ पर नजर गयी ।ऐसा लगा जैसे वो कुछ ढूंढ रही हैं।

मैंने कहा- क्या हुआ आंटी ,कोई बाहर है क्या, कुछ चाहिए आपको, आप मुझे बता सकती है।

' हां ,अरे नहीं मैं तो बस ऐसे ही देख रही थी।

' अच्छा फिर ठीक है '

चलिए भई लंबा रास्ता है अब थोड़ा आराम  से बैठ जाते हैं ।

''हैलो राहुल, हां.. हां ..बड़े आराम से मिल गई .....बेटा मां हूं मैं तेरी .....खुद को मेरा बाप मत समझा कर...... चल ठीक है अच्छा .....घर पहुंचकर फोन करूंगी मैं तुझे ......ठीक है''

"ट्रेन कितनी बदल गई है ना अब "

"जी आंटी......"

" अरे मैं कम से कम भी 20 साल बाद ट्रेन में सफर कर रही हूं ।इतने सालों में कितना कुछ बदल गया ना ट्रेन में। पहले तो चाय वाले, समान बेचने और वह होती है ना चने दाल वाली नमकीन और भी पता नहीं क्या-क्या बेचने के लिए लोग आते-जाते रहते थे। बड़ा मन लगा रहा था तब ट्रेन में ।अब ट्रेन से कहीं आती जाती नहीं, गाड़ी से ही आना जाना होता है, तो इतने सालों बाद ट्रेन देखी ।कितना कुछ बदल गया ना।

" अरे नहीं नहीं आंटी.... वैसी वाली ट्रेनें भी होती है .....लेकिन उनमें ना टाइम बहुत लगता है ।जो रुक रुक जाती हैं... वही ...वही ।

"....... अच्छा ......"

"वैसे अगर किसी को जाने की जल्दी ना हो तो उन्हीं  में जाना चाहिए।मन लगा रहता है, इसमें तो बोर हो गई मैं। यह पोता है मेरा यह अपने लैपटॉप में लगा हुआ है।"

"हा ..हा.. हा.. क्या आंटी .... आप भी... स्मार्ट फोन ले लो अपने लिए फिर देखना बोर होने के लिए भी टाइम ही नहीं बचेगा आपके पास"

 "अरे नहीं बेटा... हमारे कहां बस की है.. अब इस उम्र में.... जिंदगी के 4 दिन बचे हैं, भगवान में मन लगा रहे ...बस यही काफी है"

" भगवान में मन लगाना तो अच्छी बात है ,लेकिन हर बात में मरने मारने की बात करना क्या कुछ जरूरी होता है। मेरी सासू मां भी ऐसी ही है ।हर बात में बस मरने की बात ही करती रहती है मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है ।मैं उनको भी डांट देती हूं।"

आंटी तो थोड़ी देर में बोर होकर आराम मोड पर चली गई। और मैं सोचने लगी की ट्रेन ही क्या, जिंदगी भी कितनी बदल गई है ।लोगों को एक दूसरे से कोई मतलब ही नहीं है। हर कोई इंसान होकर इंसानों से बचने की फिराक में लगा रहता है। चाहे उसके लिए उन्हें अपने खून पसीने की कमाई क्यों ना खर्चनी में पड़ जाए। पहले लोग मनोरंजन के लिए मेले में चले जाया करते थे ,चार लोग मिलेंगे मुलाकात हो जाएगी ।मनोरंजन अब भी चाहते हैं ,लेकिन घर में ही पूरा सेट अप करके अकेले में पिक्चर देखना उन्हें ज्यादा भाता है। पहले भीड़ भाड़ में जा कर एक एक चीज देख कर खरीदने का आनंद ही कुछ अलग था ,अब कौन इतनी भीड़ में धक्के खाने जाए सब घर में बैठे-बैठे फोन पर ऑनलाइन शॉपिंग का अकेले में मजा लेना पसंद करते हैं ।ठेले पर खड़ी होकर स्ट्रीट फूड का मजा ही कुछ और था ,अब जोमैटो का घर घर में राज है और तो और अब तो जोमैटो वालों को ही टैग लाइन देनी पड़ी है कि कभी कभी चेंज के लिए घर पर भी खाना खा लेना चाहिए।☺️☺️

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" धर्मिष्ठा"