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अयोग्य ‘माननीयों’ का बढ़ता कुनबा

Patrika 2019-10-10 17:37:59

अजय शर्मा.सीकर. प्रदेश में अयोग्य माननीय का कुनबा लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले पांच साल में 780 से अधिक माननीय पंचायतीराज की सत्ता के गलियारों से आऊट हो गए। पंचायतीराज विभाग की ओर से विभिन्न शिकायतों पर एक साल में औसत 150 से 165 जनप्रतिनिधियों को अयोग्य घोषित किया गया है। जबकि पिछले 12 सालों में 1870 से अधिक जनप्रतिनिधि अयोग्य घोषित हुए है। इनमें से 15 फीसदी से अधिक दागदार जनप्रतिनिधि तो ऐसे है जिनको चुनाव लडऩे के भी अयोग्य घोषित कर दिया है। दूसरा बड़ा सच यह है कि विभाग के पास माननीयों की लगभग तीन हजार शिकायतों की जांच लंबित है। इसके बाद भी सत्ता के सहारे चहेते जनप्रतिपिनिधियों को बचाने का खेल भी जारी है। कई जनप्रतिनिधियों की शिकायतों को पांच साल से अधिक का समय भी गुजर गया लेकिन अंतिम फैसला नहीं सुनाया गया। अयोग्य जनप्रतिनिधियों को लेकर राजस्थान पत्रिका की खास रिपोर्ट।
इस तरह के मामलों में दागदार है नेताजी
प्रदेश के पंचायतीराज के जनप्रतिनिधि मुख्य तौर पर पांच तरीके से दागदार है। इनमें से 35 फीसदी के उपर भ्रष्टाचार के दाग लगे है। जबकि अन्य फर्जी अंकतालिका, जाली पट्टे, गलत दस्तावेज जारी करने, पुराने मामलों में दोषी ठहराने व संतान संबंधी शिकायतों की वजह से अयोग्य घोषित हुए है।
सरकार के साथ बदल जाते है आरोप
प्रदेश में कई ऐसे जनप्रतिनिधि भी है जिनके सरकार के साथ आरोप व अयोग्यता के मापदंड भी बदल जाते हैं। खास बात यह है कि पिछले दस वर्षो में ऐसे भी 450 से अधिक जनप्रतिनिधि है जो अयोग्य घोषित होने के बाद अपील में शिकायत खारिज होने पर योग्य भी घोषित हो चुके है।
किसी ने सोलर लाइट में घपला तो किसी ने भरी फर्जी हाजिरी
जब बचाने वाले अपने हो तो नियम-कायदों को कैसे ताक पर रखा जाता है, इसका भी बड़ा उदाहरण पंचायतीराज विभाग की शिकायतों में सामने आया है। किसी ने तय दर से दोगुना दरों पर सौलर लाइट लगवा ली तो किसी ने मनरेगा में फर्जी हाजरी फेल सरकार को चूना लगा दिया। ग्रामीणों की शिकायत व ऑडिट के आधार पर ऐसे जनप्रतिनिधियों के खिलाफ गाज गिरी।
अगले चुनावों के लिए अभी से सिफारिशी मेला
प्रदेश में अगले साल पंचायतीराज संस्थाओं के चुनाव भी होने है। इसके लिए अभी भी जनप्रतिनिधि सियासी जमीन टटोलने लग गए है। वहीं कांग्रेस के बड़े नेताओं के पास अभी से पंचायतीराज विभाग में लंबित शिकायतों को हरी झंडी दिलाने के लिए सिफारिशी मेला भी लगना शुरू हो गया है।
और यहां हर महीने 15 से अधिक शिकायत
जिले में हर माह 15 से अधिक शिकायत दर्ज हो रही हैं, लेकिन ज्यादातर शिकायतों को सीधे प्रारंभिक जांच के बाद संभागीय आयुक्त कार्यालय भेजा जाता है। यहां से कलक्टर के जरिए दूसरे अधिकारी को जांच दी जाती है। ग्रामीणों का आरोप है कि शिकायतों के चार महीने बाद भी रिपोर्ट जारी नहीं की जाती है। इसके बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। एक महीने के भीतर शिकायतों का निपटारा होना चाहिए।