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राजस्थान में कांग्रेस और भाजपा दोनों दलों में अंदरूनी घमासान रुकेंगीं?*

Press Note 2021-02-23 19:28:12

नई दिल्ली ।राजस्थान की राजनीति में सबसे ताकतवर दो दिग्गज नेताओं अशोक गहलोत और वसुन्धरा राजे को इन दिनों अपनी अपनी पार्टी में ही कतिपय   चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। गहलोत अपने उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट और उनके साथी असंतुष्ट विधायकों की बग़ावत और भाजपा की कथित साज़िश से अपनी सरकार का तख्ता पलटने से बचाने में कामयाब रहें है। बताते है कि फिर भी ख़तरा अभी टला नहीं है और पिछलें दिनों असंतुष्ट गतिविधियाँ फिर से तेज हुई हैं।

सोनिया,राहुल और प्रियंका गांधी के हस्तक्षेप से पुनःघर लोटे पायलट प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और उप मुख्यमंत्री पद गँवा अब मात्र विधायक की हैसियत में रह गए है । साथ ही सभी प्रकार की प्रोटोकोल सुविधाओं से भी वंचित हो गए है। बताया जाता है कि सचिन पायलट किसान आंदोलन की आड़ में अभी भी मौके की तलाश में है।राहुल गांधी के हाल में हुए  प्रदेश दौरे में और अजमेर में ख़्वाजा साहब की दरगाह में वार्षिक उर्स पर सोनिया गांधी की ओर से चादर भेंट करने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रमों में अपेक्षित महत्व नहीं मिलने से खिन्न सचिन पायलट ने दौसा भरतपुर और जयपुर आदि ज़िलों  के ग्रामीण इलाको में भीड़ भरे किसान सम्मेलन और पंचायतों का आयोजन कर दो दर्जन से अधिक समर्थक विधायकों के साथ अपना शक्ति प्रदर्शन कर सत्ता पक्ष और हाई कमान के समक्ष नई चुनौती पेश की है।

वहीं दूसरी ओर कमोबेश वसुन्धरा राजे भी अपने दल में मुख्य धारा से अलग- थलग किए जाने से व्यथित और रुष्ट बताई जा रहीं है। फलस्वरूप एक आध को छोड़ वे पार्टी और विधायक दल की अधिकांश बैठकों और कार्यक्रमों में भी भाग नहीं ले रही।  

वसुन्धरा राजे ने दिल्ली में हाल ही आयोजित भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में करीब एक साल बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाक़ात की है। इस मुलाक़ात के बाद प्रदेश में राजनीतिक सरगर्मियाँ तेज हो गई है।

इससे पूर्व वसुन्धरा ने  दिल्ली में कई दिनों तक पड़ाव कर पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा, केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह एवं कई अन्य केंद्रीय मंत्रियों सहित पार्टी और संगठन के वरिष्ठ नेताओं एवं पदाधिकारियों  से भेंट कर प्रदेश में पार्टी की राजनीतिक स्थिति और स्थानीय निकाय चुनावों में मिली पराजय सहित आगे होने वाले चार विधानसभा उप चुनावों आदि विषयों पर विस्तार से चर्चा कर केन्द्रीय नेताओं को ज़मीनी हालातों की जानकारी दी हैं।

इधर वसुन्धरा राजे के समर्थकों ने भी राष्ट्रीय नेतृत्व और प्रदेश में भाजपा अध्यक्ष सतीश पूनिया, राज्य विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता गुलाब चंद कटारिया,उप नेता राजेन्द्र राठौड़ और प्रदेश के प्रभारी महामंत्री एवं संगठन मंत्री आदि के समक्ष वसुन्धरा राजे को साइड लाइन करने के दुष्परिणामों के मुद्दे को जोर शोर से उठाया है और केंद्रीय नेतृत्व से माँग की है कि यदि समय रहते वसुन्धरा राजे को प्रदेश में मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया गया तो राजस्थान में आने वाले वर्षों में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की सरकार बनाना सम्भव नहीं होगा।
पूर्व विधानसभा अध्यक्ष कैलाश मेघवाल पूर्व मंत्री प्रताप सिंह सिंघवी तेज तर्रार विधायक भवानी सिंह राजावत आदि ने वसुन्धरा के पक्ष में ज़ोरदार ढंग से आवाज़ उठानी शुरू कर दी है। दिग्गज मीणा नेता डॉ किरोड़ी लाल मीणा ने भी वसुन्धरा राजे की अनदेखी को पार्टी हित में नहीं बताया है।
बताया जाता है कि वसुन्धरा समर्थकों ने प्रदेश के सभी जिलों में वसुन्धरा फ़्रेण्ड्स बैनर तले समानांतर संगठन भी खड़े कर दिए है। उनके समर्थकों द्वारा वसुन्धरा राजे के जन्म दिवस आठ मार्च अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर प्रदेश के ब्रज अंचल से वसुन्धरा राजे की देव- दर्शन यात्रा का शुभारम्भ करवा शक्ति प्रदर्शन की योजना भी बनाई जा रही है। पूर्व मन्त्री यूनुस खान बहुत सक्रिय होकर काम कर रहें है।

वसुन्धरा राजे के विकल्प के रूप में बीजेपी के वरिष्ठ नेता ओम प्रकाश माथुर, केन्द्रीय मन्त्री गजेन्द्र सिंह शेखावत और राज्य मन्त्री अर्जुन राम मेघवाल आदि के नाम चले भी चले। ओम बिरला को लोकसभा अध्यक्ष बना उनका क़द ऊँचा किया गया लेकिन 
प्रदेश में  बीजेपी का ग्राफ़  वे ऊँचाइयाँ नहीं पा सका जिसकी उम्मीद पार्टी हाई कमान ने की थी। प्रदेश में वसुन्धरा की
लोकप्रियता के ग्राफ़ में भी कोई कमी नहीं हुई है वरन एक समय उनके घोर विरोधी माने जाने वाले नेता भी उनके पक्ष  में खड़े दिख रहें है।
इधर सतीश पूनिया ग्रूप ने दावा किया है कि प्रधानमंत्री और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष  ने प्रदेश भाजपा के कार्यों की तारीफ़ की है। जबकि मेडिटेशन रिपोर्ट्स के अनुसार पार्टी हाई कमान दोनों ग्रूप्स की लड़ाई से नाराज़ है और उन्हें कड़ी कार्यवाही की चेतावनी दी गई है।

राजस्थान की राजनीति में उठ रहें इस तूफ़ान में देखना यह है कि वसुन्धरा राजे और अशोक गहलोत अपने-अपने दल में उपज रहें अंतर कलहों से निपट कर राजनीति के क्षितिज मंडल में अपनी चमक को ध्रुव तारें की तरह कैसे अनंत काल तक बरकरार रखने में कामयाब रख पायेंगे?